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तीजन बाई का निधन: पंडवानी का स्वर्णिम युग हुआ समाप्त, लोककला की अमर आवाज हमेशा रहेगी याद

तीजन बाई का निधन: पंडवानी का स्वर्णिम युग हुआ समाप्त, लोककला की अमर आवाज हमेशा रहेगी याद

छत्तीसगढ़ की पहचान, अंतरराष्ट्रीय पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का निधन पूरे देश के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनके जाने से केवल एक महान लोक कलाकार का ही नहीं, बल्कि पंडवानी की उस जीवंत परंपरा का भी एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया, जिसे उन्होंने अपनी आवाज, अभिनय और अद्भुत प्रस्तुति से दुनिया भर में नई पहचान दिलाई। आज जब उनके निधन की खबर सामने आई तो छत्तीसगढ़ से लेकर देश-विदेश तक शोक की लहर दौड़ गई। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री और कई केंद्रीय मंत्रियों सहित अनेक राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक हस्तियों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

तीजन बाई का जन्म छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में हुआ था। साधारण परिवार में जन्मी तीजन बाई ने बचपन से ही लोकगीत और महाभारत की कथाओं में गहरी रुचि दिखाई। उस समय पंडवानी गायन मुख्य रूप से पुरुषों की कला मानी जाती थी, लेकिन उन्होंने इस सोच को बदल दिया। कठिन परिस्थितियों, सामाजिक विरोध और आर्थिक संघर्ष के बावजूद उन्होंने अपने सपनों का साथ नहीं छोड़ा। अपनी मेहनत, लगन और अद्भुत प्रतिभा के बल पर उन्होंने वह मुकाम हासिल किया, जो बहुत कम कलाकारों को नसीब होता है।

पंडवानी छत्तीसगढ़ की एक प्राचीन लोककला है, जिसमें महाभारत की कथाओं को गीत, संगीत और अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। इस कला में कलाकार केवल कहानी नहीं सुनाता, बल्कि अपने अभिनय और भाव-भंगिमाओं से पात्रों को जीवंत कर देता है। तीजन बाई ने इसी कला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनके हाथ में तंबूरा और मंच पर उनकी दमदार उपस्थिति दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती थी। जब वे भीम, अर्जुन, दुर्योधन या श्रीकृष्ण के संवाद प्रस्तुत करती थीं, तो ऐसा लगता था मानो महाभारत का दृश्य आंखों के सामने जीवंत हो उठा हो।

पंडवानी की दो प्रमुख शैलियां मानी जाती हैं-वेदमती और कापालिक। वेदमती शैली में कलाकार बैठकर शांत भाव से कथा का वाचन करता है, जबकि कापालिक शैली में कलाकार खड़े होकर अभिनय, हाव-भाव और संवादों के साथ पूरी ऊर्जा से प्रस्तुति देता है। तीजन बाई ने कापालिक शैली को नई पहचान दी। उनकी प्रस्तुति इतनी प्रभावशाली होती थी कि दर्शक पूरी तरह कहानी में खो जाते थे। उनकी आवाज में ऐसा जादू था कि हर संवाद सीधे लोगों के दिलों तक पहुंचता था।

तीजन बाई ने केवल भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में भी अपनी कला का प्रदर्शन किया। उन्होंने यूरोप, अमेरिका, जापान, फ्रांस, इंग्लैंड, रूस, ऑस्ट्रेलिया और कई अन्य देशों में पंडवानी प्रस्तुत कर विदेशी दर्शकों को भारतीय लोककला से परिचित कराया। उनकी प्रस्तुतियों को हर जगह सराहना मिली। उन्होंने साबित कर दिया कि भाषा अलग हो सकती है, लेकिन कला की कोई सीमा नहीं होती।

अपने लंबे कला जीवन में तीजन बाई को अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले। उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण और बाद में देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण प्रदान किया गया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। यह सम्मान केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थे, बल्कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति और लोककला का सम्मान भी थे।

तीजन बाई का जीवन संघर्ष, आत्मविश्वास और समर्पण की प्रेरणादायक कहानी है। उन्होंने समाज की पुरानी सोच को चुनौती दी और यह साबित किया कि प्रतिभा किसी बंधन की मोहताज नहीं होती। उन्होंने हजारों युवा कलाकारों को प्रेरित किया कि मेहनत और लगन के दम पर किसी भी मंजिल को हासिल किया जा सकता है। आज छत्तीसगढ़ में पंडवानी सीखने वाले अनेक कलाकार उन्हें अपना आदर्श मानते हैं।

उनकी प्रस्तुतियों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे केवल कहानी नहीं सुनाती थीं, बल्कि हर पात्र को जीती थीं। भीम का क्रोध, अर्जुन का साहस, द्रौपदी का आत्मसम्मान और श्रीकृष्ण की नीति-इन सभी भावों को वे इतनी सहजता से प्रस्तुत करती थीं कि दर्शक खुद को महाभारत के समय में महसूस करने लगते थे। उनकी आवाज में ऊर्जा, चेहरे के भावों में गहराई और अभिनय में अद्भुत जीवंतता दिखाई देती थी।

तीजन बाई के निधन की खबर मिलते ही देशभर से शोक संदेश आने लगे। राजनीतिक नेताओं के साथ-साथ कलाकारों, साहित्यकारों और संस्कृति जगत से जुड़े लोगों ने इसे भारतीय लोककला के लिए अपूरणीय क्षति बताया। सोशल मीडिया पर भी लाखों लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी और उनकी पुरानी प्रस्तुतियों को साझा करते हुए उन्हें याद किया। छत्तीसगढ़ के लोगों के लिए यह केवल एक कलाकार का निधन नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान के एक बड़े स्तंभ को खोने जैसा है।

आज भले ही तीजन बाई हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज, उनकी कला और उनकी विरासत हमेशा जीवित रहेगी। आने वाली पीढ़ियां उनकी प्रस्तुतियों से प्रेरणा लेंगी और पंडवानी की परंपरा को आगे बढ़ाएंगी। उन्होंने पूरी दुनिया को यह बताया कि छत्तीसगढ़ की मिट्टी में कितनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत छिपी हुई है। उनकी कला ने लाखों लोगों को अपनी संस्कृति पर गर्व करना सिखाया।

तीजन बाई का जीवन इस बात का उदाहरण है कि सच्चा कलाकार कभी नहीं मरता। वह अपनी कला, अपने विचार और अपनी विरासत के माध्यम से हमेशा लोगों के दिलों में जीवित रहता है। आज तंबूरे की वह मधुर तान भले ही शांत हो गई हो, लेकिन उनकी गूंज आने वाले वर्षों तक सुनाई देती रहेगी। पंडवानी की दुनिया में तीजन बाई का नाम हमेशा स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। उनका योगदान अमूल्य है और भारतीय लोककला के इतिहास में उन्हें सदैव सम्मान और श्रद्धा के साथ याद किया जाएगा।

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