मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने अब वैश्विक राजनीति को नई दिशा दे दी है। ईरान और इज़रायल के बीच चल रहे सैन्य टकराव ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता पैदा कर दी है। इस संघर्ष का असर अब तुर्की, अज़रबैजान और पाकिस्तान की रणनीतिक साझेदारी पर भी साफ दिखाई देने लगा है। कई विश्लेषक इस गठजोड़ को “खुराफाती तिकड़ी” कहकर भी संबोधित कर रहे हैं, क्योंकि ये तीनों देश कई मुद्दों पर एक-दूसरे का खुलकर समर्थन करते रहे हैं।
दरअसल, तुर्की और अज़रबैजान लंबे समय से सैन्य और ऊर्जा सहयोग में साझेदार रहे हैं, जबकि पाकिस्तान इन दोनों देशों के साथ रक्षा और कूटनीतिक स्तर पर नजदीकियां बढ़ाता रहा है। लेकिन ईरान-इज़रायल के बीच बढ़ते टकराव ने इस त्रिकोणीय गठबंधन के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
ईरान इस पूरे क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण शक्ति है और अज़रबैजान के साथ उसके रिश्ते पहले से ही उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। वहीं तुर्की, नाटो का सदस्य होने के बावजूद कई बार पश्चिमी देशों की नीतियों से अलग रुख अपनाता रहा है। पाकिस्तान भी इस पूरे समीकरण में अपनी रणनीतिक स्थिति को संतुलित रखने की कोशिश कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान-इज़रायल संघर्ष और ज्यादा बढ़ता है, तो इसका असर केवल इन दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे मिडिल ईस्ट के साथ-साथ दक्षिण एशिया और काकेशस क्षेत्र की राजनीति भी प्रभावित हो सकती है।
ऐसे में तुर्की, अज़रबैजान और पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे अपनी रणनीतिक साझेदारी को कैसे बचाए रखें और साथ ही क्षेत्रीय संतुलन भी बनाए रखें। मिडिल ईस्ट की यह जंग आने वाले समय में वैश्विक राजनीति के नए समीकरण तय कर सकती है।



