पश्चिम बंगाल में नई सियासी हलचल: हुमायूं कबीर ने बनाई जनता उन्नयन पार्टी
बिहार के चुनावी माहौल के बाद अब पश्चिम बंगाल में भी राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। राज्य में कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव होने हैं और इससे पहले ही नई-नई सियासी गतिविधियां सामने आ रही हैं। इसी कड़ी में तृणमूल कांग्रेस (TMC) से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं। बाबरी मस्जिद के निर्माण को लेकर बयान देने के बाद सुर्खियों में आए हुमायूं कबीर ने अब अपनी नई राजनीतिक पार्टी ‘जनता उन्नयन पार्टी’ (Janata Unnayan Party) के गठन का ऐलान कर दिया है।
हुमायूं कबीर ने साफ कहा है कि उनकी राजनीति का मुख्य उद्देश्य अल्पसंख्यक वोटर्स को एकजुट करना है। उनका दावा है कि अगर उनकी पार्टी कम से कम 90 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल करती है, तो चुनाव के बाद सरकार गठन में उनकी अहम भूमिका होगी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि ऐसा नहीं हुआ, तो मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनाने का सपना अधूरा रह सकता है। उनके इस बयान के बाद बंगाल की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है।
टीएमसी से टकराव के बाद नया रास्ता
हुमायूं कबीर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के भरतपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। वे पहले तृणमूल कांग्रेस में थे, लेकिन पार्टी विरोधी गतिविधियों और बयानों के चलते उन्हें निलंबित कर दिया गया। इसके बाद से ही वे लगातार सक्रिय दिख रहे हैं। पहले उन्होंने मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनाने की बात कही और अब नई पार्टी बनाकर सीधे चुनावी मैदान में उतरने का ऐलान कर दिया है।
रविवार को हुमायूं कबीर ने खुद को टीएमसी विरोधी और बीजेपी विरोधी बताते हुए उन सभी ताकतों से एकजुट होने की अपील की, जो ममता बनर्जी की सरकार को सत्ता से हटाना चाहती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी राज्य की सभी 294 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी।
मुस्लिम वोट बैंक पर नजर
हुमायूं कबीर का पूरा फोकस मुस्लिम समाज पर नजर आ रहा है। उन्होंने कहा कि बंगाल में अल्पसंख्यक समुदाय बिखरा हुआ है और उनकी पार्टी उसे एक मंच पर लाने का काम करेगी। मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल जिले से आने वाले हुमायूं खुद को मुस्लिम हितों की राजनीति का नया चेहरा बताने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि, बंगाल की राजनीति में यह पहली बार नहीं है जब मुस्लिम नेतृत्व के नाम पर सियासत हो रही हो। इससे पहले भी पीरजादा राजनीति का असर देखा गया है। एक पीरजादा कांग्रेस के साथ हैं, तो दूसरा टीएमसी के खेमे में। ऐसे में हुमायूं कबीर के सामने तीसरा विकल्प यानी अपनी अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने का रास्ता ही बचता है, क्योंकि वे बीजेपी के साथ जाने से साफ इनकार कर चुके हैं।
कांग्रेस और टीएमसी की अपनी रणनीति
मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए कांग्रेस और टीएमसी भी अपनी-अपनी रणनीति पर काम कर रही हैं। पीरजादा खोबायेब अमीन हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुए हैं। 31 मई को उन्हें कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता दिलाई गई। खोबायेब अमीन एक प्रभावशाली परिवार से आते हैं, जिनका असर बंगाल के साथ-साथ ओडिशा और त्रिपुरा तक है। उनका परिवार शिक्षा और सामाजिक कार्यों के लिए जाना जाता है।
वहीं दूसरी ओर, टीएमसी ने फुरफुरा शरीफ के पीरजादा कासिम सिद्दीकी को पार्टी का महासचिव बनाकर बड़ा दांव खेला है। यह कदम मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करने और इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए उठाया गया माना जा रहा है।
ISF का असर और ममता की चिंता
साल 2021 के विधानसभा चुनाव में मौलवी अब्बास सिद्दीकी की अगुवाई में बनी इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) ने सभी को चौंका दिया था। कांग्रेस और लेफ्ट के साथ गठबंधन कर ISF ने अच्छा प्रदर्शन किया और अब्बास सिद्दीकी के भाई नौशाद सिद्दीकी ने भांगर सीट से जीत दर्ज की, जिसे टीएमसी का गढ़ माना जाता था।
इसके बाद 2023 के पंचायत चुनावों में भी ISF ने करीब 400 ग्राम पंचायत सीटों पर जीत हासिल की। इससे टीएमसी की चिंता बढ़ गई। माना जाता है कि इसी वजह से ममता बनर्जी ने कासिम सिद्दीकी को पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी देकर मुस्लिम वोट बैंक को अपने पक्ष में बनाए रखने की कोशिश की है।
नया पीरजादा, नई चुनौती
अब हुमायूं कबीर के रूप में बंगाल की राजनीति में एक नया ‘पीरजादा’ सामने आ गया है। उनके आने से चुनावी माहौल और भी रोचक हो गया है। जहां कांग्रेस और टीएमसी अपने-अपने प्रभावशाली चेहरों के साथ मैदान में हैं, वहीं हुमायूं कबीर अकेले अपने दम पर सियासी जमीन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि, उन पर एजेंट होने और दूसरी पार्टियों से मिलीभगत जैसे आरोप भी लग रहे हैं। इन आरोपों के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि हुमायूं कबीर की जनता उन्नयन पार्टी बंगाल की राजनीति में कितना असर डाल पाती है। आने वाले विधानसभा चुनाव यह तय करेंगे कि यह नया प्रयोग किसके लिए नुकसानदेह साबित होगा और किसके लिए फायदे का सौदा।
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