उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई सियासी सूरमाओं के नाम का डंका बजता था लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कद और राजनैतिक पराक्रम इस कदर बढ़ा कि अब उनके सामने कोई नहीं टिकता। ऐसे कई नामों का सितारा टिमटिमाता ही रह गया है। कुछ सियासी पंडित इसे संयोग कहते हैं, कुछ इसे रणनीति मानते हैं, और कुछ इसे संत-सत्ता के अद्भुत मेल का परिणाम। पर इतना तो तय है आज के दौर में योगी आदित्यनाथ के सामने खड़े होकर राजनीति करना आसान नहीं रहा।
अब करते हैं विश्लेषण और आपको समझाने की कोशिश करते हैं
(1) शिवप्रताप शुक्ला

साल 2002 में मुख्यमंत्री थे राजनाथ सिंह। गोरखपुर सदर से BJP के दिग्गज नेता, लगातार 4 बार विधायक, कैबिनेट मंत्री शिव प्रताप शुक्ला। पूरा संगठन उनके साथ था। लेकिन योगी जी ने अखिल भारतीय हिंदू महासभा से राधा मोहन दास अग्रवाल को प्रत्याशी बनाया। परिणाम चौंकाने वाला रहा और राधा मोहन दास अग्रवाल विजयी हुए जबकि शिव प्रताप शुक्ला तीसरे स्थान पर रहे। इस चुनाव के बाद शिव प्रताप शुक्ला लगभग 15 वर्षों तक संगठनात्मक राजनीति तक ही सीमित रहे। बाद में राज्यसभा और फिर राज्यपाल बनाकर उन्हें सम्मान अवश्य मिला, लेकिन सक्रिय राजनीति में उनकी भूमिका पहले जैसी नहीं रही।
(2) मनोज सिन्हा

2017 में यूपी में BJP की ऐतिहासिक जीत के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए जिस नाम की सबसे ज्यादा चर्चा थी, वो थे मनोज सिन्हा। यहां तक कहा गया कि बनारस में उन्हें CM स्तर का प्रोटोकॉल तक मिलने लगा था। लेकिन राजनीति परिस्थितियों से चलती है। 2019 लोकसभा चुनाव में मनोज सिन्हा हार गए। बाद में उप राज्यपाल बनकर एक तरह से सक्रिय राजनीति से सम्मानजनक दूरी बन गई।
(3) उपेंद्र दत्त शुक्ला

साल 2018 गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में योगी आदित्यनाथ के विरोधी गुट ने शिव प्रताप शुक्ला के करीबी उपेंद्र दत्त शुक्ला को टिकट दिलाया। नतीजा वही रहा चुनाव में पराजय और राजनीतिक प्रभाव सीमित हो गया।
(4) पूर्व ब्यूरोक्रेट्स अरविंद कुमार शर्मा

पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के सबसे भरोसेमंद ब्यूरोक्रेट्स में गिने जाने वाले AK शर्मा। 2021 में गुजरात से समय से पहले VRS लेकर यूपी की राजनीति में प्रवेश किया। चर्चा थी कि CM या Dy CM बनाए जाएंगे। लेकिन हकीकत में बीजेपी प्रदेश उपाध्यक्ष (जहां पहले से 17 लोग थे) बाद में किसी तरह MLC बने और वर्तमान में यूपी में कैबिनेट मंत्री हैं। जिस स्तर की उम्मीदें थीं, उस अनुपात में उनका राजनीतिक प्रभाव उतना सशक्त बनता नहीं दिखा और भविष्य को लेकर चर्चाएं बनी हुई हैं।
(5) केशव प्रसाद मौर्य

2017 में यूपी BJP की जीत के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे ज्यादा चर्चा केशव प्रसाद मौर्य के नाम की थी। प्रदेश अध्यक्ष भी थे, लेकिन मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य को Dy CM से संतोष करना पड़ा। साल 2018 में योगी आदित्यनाथ के खिलाफ पार्टी के लगभग 200 विधायक धरने पर बैठे। यह भी सबने देखा। फिर आया साल 2022 का चुनाव। केशव प्रसाद मौर्य अपनी सीट हार गए। फिर भी Dy CM बने और मंत्रालय सीमित कर दिया गया।
निष्कर्ष
राजनीति संकेतों से चलती है, और संकेत बहुत कुछ कह जाते हैं। अब इससे ज्यादा और क्या बताया और कहा जा सकता है।



